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Election-2019

{Rahul Gandhi Next PM?}क्या वाकई प्रधानमंत्री मटेरियल हैं राहुल गाँधी?

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PC: Satish Acharya

वो जो एक पुराने राजनैतिक परिवार का हिस्सा हैं, वो जो भारतीय राजनीती में त्याग की मूर्ति मानी जाने वाली माँ के बेटे हैं, वो जो भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री के सुपुत्र हैं, जिनका बचपन प्रधानमंत्री दादी की गोदी में गुजरा है और जिनकी जवानी ने असमय पिता का साया सर से उठता हुआ देखा है! लेकिन यह किसी भी आम व्यक्ति के जीवन की कहानी नहीं है, ये बात है उस युवा नेता की जिसने कांग्रेस की साख और गाँधी परिवार का वजूद देश में अबतक बनाये रखा है! एक ऐसा नेता जो बहुत ट्रोल हुआ, अपनी राजनितिक अक्षमता के कारण, अपने भाषा के अधूरे ज्ञान के कारण, अपने गड़बड़ भाषणों के कारण और अपने कई तरह के ऐसे मजाकिया रवैय्ये के कारण जिसकी वजह से सोशल मीडिया ने उन्हें नाम दिया “पप्पू”🤪!

जी हाँ हम बात कर रहे हैं, कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गाँधी की, ये वही राहुल गाँधी हैं जो पास जाकर देश की संसद में प्रधानमंत्री को उनके स्थान से उठने के लिए कहते हैं, बिना कारण बताये फिर गले लगते हैं, और फिर अपनी कुर्सी पर आकर आँख मारते हैं, जिसे पूरा देश देखता है! टीवी कैमरों की नजरों से अनभिग्य लेकिन देश की नजरों में आने के बाद हंसी के पात्र बनने वाला क्या एक ऐसा नेता जिसकी ५० साल उम्र होने के बाद भी उसकी पार्टी उसे युवा नेता, युवा नेता कहकर बुलाती है, क्या वाकई इस देश के प्रधानमन्त्री पद का ठोस उम्मीदवार हो सकता है?

कभी अमेठी की सड़कों पर जाइए, गलियों में घूमिये, माँ सोनिया या पिता राजीव के गढ़ रहे इस संसदीय क्षेत्र से सांसद बनकर लोकसभा में आये राहुल गाँधी की छाप कहीं ख़ास दिखाई नहीं देती! क्या राष्ट्रीय राजनीती में व्यस्त होने के कारण राहुल गाँधी अमेठी पर अधिक ध्यान नहीं दे पाते या फिर अपने चुनावी क्षेत्र में जाने का मौका उन्हें सिर्फ चुनावों में मिल पाता है, इसके जवाब की तलाश में आप भी गोलमोल ना घूम जाएँ तो कहिये!

कभी मंच से फटा हुआ कुरता दिखाना हो, कभी अपनी ही पार्टी के नेताओं के नाम भूलना हो या गलत सलत नाम लेना हो, कभी आलू से सोना निकालने वाली बात पर ट्रोल होना हो, किसी गंभीर जगह पर मुस्कुराना हो, गाँधी जी की समाधि में फोन से देख देखकर अपना सन्देश लिखना हो या देश के प्रधानमंत्री को ही चोर बताना हो! ऐसा कुछ भी नहीं है जो राहुल गाँधी की छवि को सशक्त नेता के रूप में स्थापित करता हो, राहुल गाँधी आयु में ५० वर्ष के करीब हैं लेकिन उनके नेतृत्व की गंभीरता से अधिक उनके बचपने की भावुकता उनमे अधिक नजर आती है, कभी जनेऊ धारण कर पंडित बन जाते हैं और कभी टोपी पहन मुल्ला जी के किरदार में आ जाते हैं, किसी तबके में खड़े होते हैं तो लोग उनकी जगह उनके विरोधी नेता के नारे लगाने लग जाते हैं, सूरत की महिलाओं पर की गयी दूध वाली टिपण्णी हो या राफेल हवाई जहाज पर बदल बदलकर बताये गए दामों की दास्ताँ, सोशल मीडिया में हर जगह राहुल बाबा ट्रोल हो ही जाते हैं!

ऐसे में क्या आपको भी लगता है कि राहुल गाँधी प्रधानमंत्री पद के सशक्त उम्मीदवार हैं? क्या जनता में वाकई राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री बनाने का हौसला है?

 

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Election-2019

{Modi VS Gandhi}क्या मोदी बनाम कांग्रेस बनाम तीसरा मोर्चा होने वाला है इस लोकसभा चुनाव में?

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BY- Satish Acharya
PC: Satish Acharya

एक तरफ कोई अपने धुर विरोधी से हाथ मिलाकर उसे अपना दोस्त बता रहा है, एक तरफ कोई अपने राज्य में बड़ी बड़ी रैलियाँ कर अपना दमखम दिखा रहा है, एक तरफ कोई राफेल के नाम पर सरकार पर आरोप लगा रहा है और एक तरफ कोई गुटबाजी के खेल में अपने गुट से दुसरे गुट में जा रहा है!

लोकसभा चुनावों का असर साफ़ है, एक तरफ मोदी सरकार है और दूसरी तरफ से पूरा विपक्ष, सत्ता वाले कहते हैं कि देश में अभी भी प्रधानमन्त्री जी की लहर है, लोग उन्हें चाहते हैं तो दूसरी तरफ विपक्ष देश के चौकीदार को ही चोर बता रहा है! सब लोकतंत्र के इस चौसर में अपने अपने पासे फेंकने में लगे हुए हैं, लेकिन जीत किसकी होगी ये समय ही बताएगा! कभी इस देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि लोकतंत्र संख्या का खेल है, जिसके पास अधिक संख्या है वही सत्ता के सिंहासन पर बैठ सकता है! २०१४ की परिस्थितियों से आज की परिस्थितियों की तुलना करने पर हम पाते हैं कि पिछले ५ सालों में मोदी सरकार को लगातार निशाने पर रखने वाला विपक्ष भी एकमत दिखाई नहीं देता है, उधर सत्ता की मलई फिर चखने के लिए भाजपा को इसबार कड़ी मशक्कत करनी पड़ सकती है क्युकी सूत्रों के मुताबिक़ राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में हुए चुनावों के परिणाम के बाद कांग्रेस मजबूत हुयी है और इससे सीधा फायदा राहुल गाँधी की छवि को पड़ा है! राहुल गाँधी के साथ ही इस चुनाव में प्रियंका गांधी का कूदना भी यह दिखाता है कि कांग्रेस कोई कसर बाकी नहीं छोड़ना चाहती है! जहाँ तक सवाल है उत्तरप्रदेश के सपा और बसपा के गठबंधन का तो इस लोकसभा चुनाव में यह एक प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं, पिछले चुनाव की शिकस्त ने इन दलों को साथ में आने के लिए अंततः मजबूर कर ही दिया है!

उधर महागठबंधन की बात करें तो हर धड़े का अपना एक नेता है जो प्रधानमंत्री बनना चाहता है, फिर चाहे वो बंगाल की मुख्यमंत्री हों या दिल्ली के मुख्यमंत्री एक से बढ़कर एक धुरंधर महागठबंधन की गंगा में हाथ धोने में लगे नजर आते हैं!

वहीं भाजपा इन राजनैतिक दलों में हो रही उथलपुथल को इन दलों की सत्ता पाने की मंशा और सत्ता लोभी मानसिकता बता रही है, साथ ही यह भी कह रही है कि देश मोदी जी के साथ खड़ा है और पिछले पांच सालों में मोदी सरकार ने कई ऐसे ऐतिहासिक कदम उठाए हैं, जिसके कारण जनता फिर मोदी सरकार को ही चुनने जा रही है, पार्टी प्रवक्ताओं की माने तो इसबार भाजपा ३०० से भी ज्यादा सीटों के जादुई आंकड़े को छू सकती है और सशक्त रूप से केंद्र में सरकार बना सकती है, प्रधानमंत्री मोदी को भी अपने आप पर और पार्टी कार्यकर्ताओं पर पूरा भरोसा है, इसीलिए विडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये वे हरदिन देश के भाजपा कार्यकर्ताओं से स्वयं सीधे जुड़कर उनसे रिपोर्ट ले रहे हैं और चुनाव प्रचार की बारीकियां समझा रहे हैं!

अब देखना ये है इस लोकसभा चुनाव में जनता किसके सर पर प्रधानमंत्री का ताज रखती है या फिर देश में त्रिशंकु लोकसभा की स्थिति पैदा होती है!

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क्या चुनावी मिठाई है सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण?

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पिछले दिनों सरकार ने एक अहम फैसला लिया, फैसला था सरकार द्वारा गरीब सवर्णों को नौकरी और शिक्षा में १० प्रतिशत आरक्षण का फैसला! केंद्र की मोदी सरकार द्वारा लिए गए इस फैसले को जहाँ एक ओर विपक्षी दल चुनावी पैंतरा बता रहे हैं वहीँ दूसरी ओर सरकार इसे गरीब सवर्णों पर वर्षों से हो रहे शोषण और अत्याचार पर अंकुश और उन्हें न्याय दिलाने के लिए लिया गया अहम फैसला बता रही है!

सरकार का कहना है विपक्षी दल केवल ढोल पीट रहे हैं लेकिन सरकार ने अंततः सवर्णों के पक्ष में फैसला लिया है! सरकार का मानना है कि गरीब तबके के हर उस व्यक्ति का विकास जरुरी है जो देश की व्यवस्था में सहयोगी है, जो लोकतंत्र का एक अहम् हिस्सा है!

संसद में अपनी बात रखते हुए भाजपा के वरिष्ठ नेता और सांसद हुकुमदेव नारायण ने कहा कि यह सरकार अन्त्योदय की सरकार है जो गरीब पिछड़े शोषित वंचित की सरकार है, सरकार का यह फैसला देश के हमारे गरीब सवर्ण भाइयों बहनों की खुशहाली और उनके जीवन की कठिनाइयों को कम करने में अहम भूमिका अदा करेगा!

वहीँ भाजपा प्रवक्ताओं का कहना है कि इस फैसले को चुनावी जूमला और चुनावी रंजिश बताने वाले विपक्षी दल पहले अपने गिरेबान में झांकें कि इस और उन्होंने अपने समय में क्या कदम उठाये थे, और इसे चुनावी स्टंट बताने वाले राजनैतिक दलों के नेता स्वयं क्यों इस बिल का समर्थन कर रहे हैं, क्यों इस संशोधन पर विरोध नहीं कर रहे हैं? भाजपा प्रवक्ताओं को उत्तर देते हुए कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि मोदी सरकार आरक्षण का महज नाटक रच रही है और एक चुनावी स्टंट कर रही है, इतने समय तक सत्ता में रहने के बाद चुनावी साल के समय ही आखिर क्यों ये आरक्षण का पासा सवर्णों की ओर फेंका जा रहे है, यह सबकी समझ में आ रहा है और इस मुद्दे पर कैसे चुनावों पर फायदा लेने की कोशिश की जा रही है यह देश की जनता के सामने है, अभी तीन राज्यों में हुयी हार के डर का यह परिणाम है!

वहीँ केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने इसका समर्थन किया है और इसे सवर्णों के विकास के लिए लिया गया अहम फैसला बताया हैं उनका कहना है कि इतने सालों तक गरीब सवर्णों को कुछ न देने वाली कांग्रेस अब इस फैसले को चुनावी स्टंट बताकर इसका अपमान कर रही है, साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि कांग्रेस द्वारा इस ओर कोई कदम नहीं उठाये गए थे, जो मोदी सरकार ने उठाये हैं और यह गरीब तबके के लिए एक ख़ुशी की बात है, उन्हें यह पता है कि केंद्र की मोदी सरकार गरीब हित के लिए कार्य कर रही है!

अब देखने की बात ये है कि २०१९ में होने वाले लोकसभा चुनावों पर इसका कोई असर पड़ता है क्या नहीं यह समय ही तय करेगा, लेकिन इस फैसले से इतना तो साफ़ है कि सरकार भी चुनावों में अपना हित साधने और प्रचार प्रसार में कहीं पीछे नहीं है!

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Election-2019

क्या इंदिरा का करिश्मा दोहरा पाएंगी प्रियंका?

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प्रियंका गांधी इससे पहले राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के लिए नए मुख्यमंत्रियों के चयन सहित अपनी माँ और भाई के साथ पार्टी में महत्वपूर्ण निर्णय लेने में सक्रिय रूप से शामिल थीं। वर्षों से चली आ रही अटकलों के बीच गांधी परिवार की प्रियंका गांधी वाड्रा ने बुधवार को अपने भाई और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ उत्तर प्रदेश पूर्व के महासचिव के रूप में राजनीति में प्रवेश किया, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लोकसभा सीटें भी शामिल हैं।

हाई-स्टेक आम चुनावों से पहले राज्य में कांग्रेस की मंशा को पूरा करने के इरादे से, प्रियंका की नियुक्ति तुरंत कांग्रेस के नेताओं और उसके सहयोगियों के साथ राजनीतिक बहस का मुद्दा बन गई और यह कहते हुए उनका स्वागत किया कि वह ‘एक बड़ी सफलता’ होगी। पार्टी द्वारा एक बयान में कहा गया है कि प्रियंका फरवरी के पहले सप्ताह से अपना नया कार्यभार संभालेंगी। 47 वर्षीय, अपने भाई, राहुल की हिंदी हार्टलैंड राज्य में सहायता करेंगे, जो 1980 के दशक के मध्य तक पार्टी का गढ़ था।

राहुल ने कहा, “मैं बहुत खुश हूं कि मेरी बहन प्रियंका लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में मेरी मदद करेंगी, वह बहुत सक्षम हैं,” हम पीछे के पैर पर नहीं खेलेंगे, गुजरात हो या उत्तर प्रदेश। ”

अमेठी में उन्होंने संवाददाताओं से कहा, “मुझे लगता है कि यह निर्णय यूपी की राजनीति में नई सोच लाने में मदद करेगा और यूपी की राजनीति में सकारात्मक बदलाव लाएगा।”

‘यूपी एक नई आशा और करुणामय भारत का निर्माण करने के लिए केंद्रीय है। प्रियंका और ज्योतिरादित्य की अगुवाई में नई यूपी अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की टीम राज्य में एक नई तरह की राजनीति की शुरुआत करेगी। गांधी ने ट्विटर पर कहा, हम यूपी में युवाओं को राज्य को बदलने के लिए एक नया मंच प्रदान करेंगे।

प्रियंका की नियुक्ति के एक स्पष्ट संदर्भ में, मोदी ने कहा कि ‘कई मामलों’ के विपरीत, जहां परिवार पार्टी है, भाजपा के लिए पार्टी परिवार है।

भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि राहुल गांधी ने अन्य विपक्षी दलों से अस्वीकृति का सामना करने के बाद पारिवारिक ‘बैसाखी’ का विकल्प चुना है। शाहनवाज़ हुसैन ने कहा कि कांग्रेस की हार आसन्न है और प्रियंका की प्रविष्टि को होने से नहीं रोका जा सकता है। अब तक, प्रियंका की राजनीतिक पकड़ काफी हद तक राज्य में उनके परिवार के सदस्यों द्वारा आयोजित निर्वाचन क्षेत्रों में प्रचार रैलियों में दिखाई देने तक सीमित थी, जिसमें किसी भी राज्य में सबसे अधिक 80 लोकसभा सीटें थीं।

पार्टी कार्यकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि प्रियंका गांधी, जो सक्रिय राजनीति की गांधी परिवार की विरासत को जारी रखती हैं, अपनी मां सोनिया गांधी के निर्वाचन क्षेत्र रायबरेली से चुनाव लड़ सकती हैं। कांग्रेस में कई लोगों ने कहा कि उनका प्रवेश राज्य के पार्टी कार्यकर्ताओं में आवश्यक ऊर्जा को बढ़ावा देगा, जहां वर्षों से कांग्रेस का प्रभाव कम हो रहा है और जहां समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने गठबंधन की घोषणा की है।

कांग्रेस नेताओं को यह भी लगता है कि प्रियंका भीड़ को आकर्षित करने में मदद करेंगी, खासकर युवाओं को और सवर्णों और अल्पसंख्यकों के वोटों को कांग्रेस की झोली में वापस लाएंगी। ऐसा लगता है कि पार्टी के नेता सपा-बसपा गठबंधन को ‘फिर से संगठित’ कांग्रेस के साथ काम करने के लिए मजबूर कर सकते हैं।

यह कहते हुए कि उनकी सपा और बसपा के बीच कोई दुश्मनी नहीं है, राहुल गांधी ने कहा, “हम भाजपा को हराने के लिए साथ मिलकर काम कर सकते हैं… लेकिन हमारा काम कांग्रेस के लिए जगह बनाना है और जिसके लिए हमने एक बड़ा कदम उठाया है कदम।

” राहुल गांधी ने पार्टी के वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को उत्तर प्रदेश पश्चिम के लिए AICC महासचिव नियुक्त किया। पार्टी नेताओं ने कहा कि राज्य की 80 सीटों के लिए जिम्मेदारी सिंधिया और प्रियंका गांधी के बीच 40-40 विभाजित की गई है।

राजनीति में स्वाभाविक रूप से लंबे समय से अपनी दादी इंदिरा गांधी का करिश्मा विरासत में पाने वाली प्रियंका गांधी इससे पहले राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के लिए नए मुख्यमंत्रियों के चयन सहित अपनी मां और भाई के साथ पार्टी में महत्वपूर्ण निर्णय लेने में सक्रिय रूप से शामिल थीं।

पंजाब कांग्रेस में मनप्रीत बादल और नवजोत सिंह सिद्धू की एंट्री शुरू करने में भी उनकी अहम भूमिका थी।

दो की मां, प्रियंका ने रॉबर्ट वाड्रा से शादी की, जो हरियाणा और राजस्थान में एक भूमि पंक्ति में उलझे हुए हैं, और प्रवर्तन निदेशालय द्वारा जांच का सामना कर रहे हैं। प्रियंका गांधी के राजनीति में औपचारिक रूप से प्रवेश करने का स्वागत करते हुए, कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री आर पी एन सिंह, जो पूर्वी उत्तर प्रदेश के हैं, ने कहा कि वह निश्चित रूप से राज्य में सांप्रदायिक और जातिवादी ताकतों के खिलाफ लड़ाई में एक बड़ी प्रेरणा प्रदान करेंगे।

जनता दल-यूनाइटेड के उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर ने उत्तर प्रदेश पूर्व के लिए कांग्रेस के महासचिव के रूप में नियुक्ति को ‘भारतीय राजनीति में सबसे बहुप्रतीक्षित प्रविष्टियों में से एक’ बताया। कांग्रेस के सहयोगी और राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने इस नियुक्ति का स्वागत करते हुए कहा कि यह न केवल युवाओं और पार्टी के कैडर को उत्साहित करेगा बल्कि राजनीति में 50 प्रतिशत महिला आबादी को प्रेरित करेगा।

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